ऑर्डर और उन्हें लगाने का तरीकापाठ 1 (कुल 7)शुरुआती

मार्केट ऑर्डर बनाम लिमिट ऑर्डर

हर सौदे में आपको सबसे अहम चुनाव यही करना होता है: रफ्तार या कीमत। दोनों एक साथ नहीं मिल सकते।

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आप जो भी ऑर्डर लगाते हैं, वह दो ऐसी चीजों के बीच का चुनाव है, जो आपको एक साथ नहीं मिल सकतीं:

  • ऑर्डर एग्जीक्यूट (यानी पूरा) होने की निश्चितता
  • कीमत की निश्चितता

मार्केट ऑर्डर पहली चीज चुनता है। लिमिट ऑर्डर दूसरी चीज चुनता है।

मार्केट ऑर्डर: "अभी खरीदें, कीमत चाहे जो हो"

मार्केट ऑर्डर कहता है: इस समय उपलब्ध सबसे अच्छी कीमत पर तुरंत एग्जीक्यूट करें।

आप कोई कीमत तय नहीं करते। ऑर्डर बुक में जो भी कीमत मिल रही है, आप उसे स्वीकार कर रहे हैं।

उदाहरण

इस समय ऑर्डर बुक में पेंडिंग बिक्री ऑर्डर:

कीमतमात्रा (क्वांटिटी)
₹250.0030
₹250.1050
₹251.50400

आप 200 शेयर खरीदने का मार्केट ऑर्डर लगाते हैं।

  • ₹250.00 पर 30 शेयर = ₹7,500
  • ₹250.10 पर 50 शेयर = ₹12,505
  • ₹251.50 पर 120 शेयर = ₹30,180

कुल ₹50,185, औसत ₹250.93।

आपने स्क्रीन पर ₹250 देखा था। आपने औसतन लगभग ₹251 चुकाए, क्योंकि ₹250 के आसपास सिर्फ 80 शेयर उपलब्ध थे। इस अंतर को स्लिपेज कहते हैं।

ज्यादा ट्रेडिंग वाले शेयर में स्लिपेज कुछ पैसे का होता है, और उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। कम ट्रेडिंग वाले शेयर में यह कई प्रतिशत हो सकता है, और यह पूरा नुकसान आपका होता है।

लिमिट ऑर्डर: "खरीदें, लेकिन इस कीमत से ऊपर नहीं"

लिमिट ऑर्डर कहता है: सिर्फ मेरी कीमत पर या उससे बेहतर कीमत पर एग्जीक्यूट करें।

  • ₹250 पर खरीद का लिमिट ऑर्डर → ₹250 या उससे कम पर फिल होता है, कभी ज्यादा पर नहीं।
  • ₹260 पर बिक्री का लिमिट ऑर्डर → ₹260 या उससे ज्यादा पर फिल होता है, कभी कम पर नहीं।

"या उससे बेहतर" वाली बात सच में लागू होती है। जब सबसे कम ऑफर ₹249.50 हो, तब ₹250 पर लगाया गया खरीद का लिमिट ऑर्डर ₹249.50 पर फिल होता है, ₹250 पर नहीं। आपको कभी अपने लिमिट प्राइस से खराब कीमत नहीं मिलती, और कभी-कभी बेहतर कीमत मिल जाती है।

इसका नुकसान: अगर कीमत कभी आपके लिमिट प्राइस तक नहीं पहुँचती, तो कुछ नहीं होता। आप कतार में इंतजार करते रहते हैं, और दिन के अंत में ऑर्डर एक्सपायर हो जाता है (जब तक आपने ज्यादा लंबी वैलिडिटी (वैधता) न चुनी हो)।

उदाहरण

शेयर ₹255 पर ट्रेड हो रहा है। आप ₹250 पर खरीद का लिमिट ऑर्डर लगाते हैं।

स्थिति 1: दिन में कीमत गिरकर ₹249 पर आ जाती है। आपका ऑर्डर ₹250 या उससे बेहतर कीमत पर फिल हो जाता है। बढ़िया।

स्थिति 2: कीमत कभी ₹253 से नीचे नहीं आती, और ₹258 पर बंद होती है। आपका ऑर्डर बिना फिल हुए एक्सपायर हो जाता है। आपके पास एक भी शेयर नहीं है, और शेयर आपको पीछे छोड़कर ऊपर निकल गया।

यह दूसरी स्थिति ही लिमिट ऑर्डर का असली नुकसान है, और यह कोई छोटा नुकसान नहीं है।

पार्शियल फिल

लिमिट ऑर्डर आंशिक रूप से भी फिल हो सकता है। मान लें, आपने ₹250 पर 500 शेयरों का ऑर्डर लगाया, और ₹250 या उससे बेहतर कीमत पर सिर्फ 180 शेयर उपलब्ध हैं, तो आपको 180 शेयर मिलेंगे। बाकी 320 शेयर कतार में इंतजार करते रहते हैं।

जब तक ऑर्डर बुक में पर्याप्त मात्रा मौजूद है, मार्केट ऑर्डर पूरी तरह फिल होते हैं। ज्यादा लिक्विडिटी (तरलता) वाले शेयरों में आमतौर पर ऐसा होता है, और कम लिक्विडिटी वाले शेयरों में कभी-कभी नहीं होता।

कौन-सा इस्तेमाल करें, ईमानदारी से कहें तो

लिमिट ऑर्डर तब इस्तेमाल करें, जब:

  • शेयर में बहुत कम ट्रेडिंग होती हो — हमेशा
  • आपके मन में कोई खास कीमत हो
  • आप शेयर के सामान्य वॉल्यूम के मुकाबले बड़ा ऑर्डर लगा रहे हों
  • बाजार में उतार-चढ़ाव ज्यादा हो, या बाजार खुलने के बाद के पहले कुछ मिनट हों
  • आप स्क्रीन पर नजर नहीं रख रहे हों

मार्केट ऑर्डर तब ठीक माना जा सकता है, जब:

  • शेयर में बहुत ज्यादा लिक्विडिटी हो और बिड-आस्क स्प्रेड एक-दो पैसे का हो
  • आपको इसी वक्त बाहर निकलना हो — स्टॉप-लॉस ट्रिगर हो रहा हो, कोई बुरी खबर आई हो, या कोई इंट्राडे पोजीशन बंद करनी जरूरी हो
  • सटीक कीमत के मुकाबले ऑर्डर का पूरा हो जाना कहीं ज्यादा मायने रखता हो

बीच का रास्ता

कई ट्रेडर ऐसा लिमिट ऑर्डर इस्तेमाल करते हैं, जो मौजूदा बाजार भाव पर या उससे थोड़ा आगे लगाया जाता है — यानी सबसे कम ऑफर से थोड़ा ऊपर खरीद का लिमिट ऑर्डर। यह मार्केट ऑर्डर की तरह लगभग तुरंत एग्जीक्यूट हो जाता है। लेकिन अगर ऑर्डर बुक में उम्मीद से कम ऑर्डर हों, तो नुकसान की एक पक्की ऊपरी सीमा बनी रहती है।

इससे आपको मार्केट ऑर्डर की ज्यादातर रफ्तार मिल जाती है, और सुरक्षा की एक सीमा भी बनी रहती है। नए निवेशक के लिए अक्सर यही सबसे अच्छी पहली पसंद होती है।

मुख्य बातें

  • मार्केट ऑर्डर = पक्का एग्जीक्यूशन, अनिश्चित कीमत। लिमिट ऑर्डर = पक्की कीमत, अनिश्चित एग्जीक्यूशन।
  • स्लिपेज आपकी देखी हुई कीमत और मिली हुई कीमत के बीच का अंतर है, और लिक्विडिटी घटने पर यह बढ़ता है।
  • लिमिट ऑर्डर आपकी कीमत या उससे बेहतर कीमत पर फिल होता है, कभी खराब कीमत पर नहीं — लेकिन हो सकता है कि वह फिल ही न हो।
  • जिस शेयर में बहुत कम ट्रेडिंग होती है, उसमें कभी मार्केट ऑर्डर इस्तेमाल न करें।
  • बाजार भाव से थोड़ा आगे लगाया गया लिमिट ऑर्डर आपको रफ्तार भी देता है और सुरक्षा की सीमा भी।

अपनी समझ जाँचें

3 में से 0 का जवाब दिया

  1. 1.आप ₹100 पर खरीद का लिमिट ऑर्डर लगाते हैं, और सबसे कम उपलब्ध ऑफर ₹99.20 है। आप कितनी कीमत चुकाएँगे?
  2. 2.मार्केट ऑर्डर किस स्थिति में सबसे खतरनाक होता है?
  3. 3.लिमिट ऑर्डर का मुख्य जोखिम क्या है?

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

नए निवेशक को कौन-सा ऑर्डर टाइप इस्तेमाल करना चाहिए?
ज्यादातर स्थितियों में लिमिट ऑर्डर, क्योंकि यह तय कर देता है कि आप ज्यादा से ज्यादा कितनी कीमत चुकाएँगे। मार्केट ऑर्डर पक्के एग्जीक्यूशन के बदले यह नियंत्रण छोड़ देता है।
क्या ऐसा हो सकता है कि लिमिट ऑर्डर एग्जीक्यूट ही न हो?
हाँ। अगर कीमत कभी आपके लिमिट प्राइस तक नहीं पहुँचती, तो दिन के अंत में ऑर्डर बिना फिल हुए बस एक्सपायर हो जाता है।
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